झारखंड चुनाव: पहले आदिवासी मंत्री का पूर्व IAS बेटा MLA बनने के लिए लड़ रहा, करो या मरो का मुकाबला | Jharkhand Election former IAS Jyoti Bhramar Tubid bjp candidate from Chaibasa

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पूर्व IAS तुबिद के लिए करो या मरो का मुकाबला

पूर्व IAS तुबिद के लिए करो या मरो का मुकाबला

चाईबासा सीट पर भाजपा के टिकट के लिए कई नेता दावेदार थे। चूंकि जेबी तुबिद 2014 का चुनाव इस सीट पर हार गये थे इसलिए नये उम्मीदवार उतारने की चर्चा थी। इस सीट पर टिकट फाइनल करने के लिए भाजपा को बहुत माथापच्ची करनी पड़ी। लेकिन तुबिद की साफसुथरी छवि और शालिनता अन्य दावेदारों पर भारी पड़ गयी। चुनाव हारने के बाद भी तुबिद पांच साल तक चाईबासा में लोगों के बीच काम करते रहे। टिकट कटने की अफवाहों पर भी वे विचलित नहीं हुए और पार्टी के लिए समर्पित रहे। अंत में भाजपा ने उनके नाम पर मुहर लगा दी। तुविद प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी छोड़ कर राजनीति में आये हैं। पिछला चुनाव वे बुरी तरह हार गये थे। उन्हें झामुमो के दीपक बिरुआ वे करीब 34 हजार वोटों से हराया था। एक साधारण ग्रेजुएट ने एक पूर्व IAS को हरा दिया था। इस बार तुविद ने जमीन से जुड़ कर काम किया है। 2018 में चाईबासा नगर परिषद के अध्यक्ष पद के भाजपा उम्मीदवार अनूप सुल्तानिया के लिए जनसम्पर्क अभियान चल रहा था। इस बीच जेबी तुविद ने अनूप के लिए रिक्शा चला कर सबको हैरान कर दिया था। अनूप रिक्शे पर बैठे थे और तुबिद रिक्शा चला कर उन्हें लोगों के घर-घर तक पहुंचा रहे थे। उनकी इस तस्वीर ने तब खूब सुर्खियां बोटरी थीं। तब लोग कहने लगे थे कि राज्य का पूर्व होम सेक्रेटरी बन गया रिक्शापुलर। 2019 के विधानसभा चुनाव में तुबिद कांटे का मुकाबला दे रहे हैं।

भाजपा और झामुमो में कांटे का मुकाबला

भाजपा और झामुमो में कांटे का मुकाबला

जेबी तुबिद 1983 बैच के IAS अधिकारी थे। तुबिद ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए 2014 में सरकारी सेवा से वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया था। वे भाजपा में शामिल हो गये। 2014 का विधानसभा चुनाव उन्होंने अपने गृहक्षेत्र चाईबासा से लड़ा। लेकिन झामुमो के दीपक बिरुआ से हार गये थे। फिर भाजपा ने उन्हें प्रवक्ता बनाया था। 2019 विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने जो घोषणा पत्र तैयार किया है उसमें तुबिद का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इस बार के चुनाव में तुबिद अपने पूर्व IAS की इमेज से बाहर निकल गये हैं। उन्होंने गांव-गांव घूम कर जले ट्रांसफार्मरों का बदलवाया है। गांव के लोग उन्हें समझने लगे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि दीपक बिरुआ झामुमो के एजेंडे पर कल्याणकारी योजनाओं में बाधा पहुंचाते हैं। वे ऐसा सरकार को घेरने के लिए करते हैं लेकिन नुकसान तो गरीब लोगों का हो रहा है। दीपक बिरुआ मजबूत उम्मीदवार हैं लेकिन बदली हुई परिस्थितियें में तुबिद 2014 से बहुत आगे निकल गये हैं। इस बार एकतरफा नहीं बल्कि नेक टू नेक फाइट है।

तुबिद के पिता थे पहले आदिवासी मंत्री

तुबिद के पिता थे पहले आदिवासी मंत्री

जेबी तुबिद पिता श्यामू चरण तुविद मशहूर स्वतंत्रता सेनानी थे। वे विनोबा भावे के सहयोगी भी थे। वे बिहार-झारखंड के पहले आदिवासी मंत्री थे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय श्यामू चरण पटना कॉलेज के छात्र थे। वे भी आंदोलन में सक्रिय थे। अंग्रेजों के चकमा दे कर वे पटना से पैदल ही रांची पहुंच गये थे। करीब 324 किलोमीटर की दूरी उन्होंने जंगलों और पहाडों से गुजर कर तय किया था। 1954 में कांग्रेस ने उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया था। फिर 1961 में वे बिहार के वन और पंचायती राज मंत्री बने थे। श्यामू चरण तुबिद पहले आदिवासी नेता थे जिन्हें बिहार के मंत्रिमंडल में शामिल किया था। फिर वे 1969 से 1973 बिहार लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष रहे। 2018 में 98 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। उन्होंने अपने पुत्र ज्योति भ्रमर ( जेबी) की पढ़ाई पर शुरू से ध्यान रखा। इसकी वजह से जेबी तुबिद का मशहूर नेतरहाट विद्यालय में चयन हुआ था। नेतरहाट के क्वालिटी एजुकेशन की वजह से ही जेबी बाद में IAS बने थे। तुबिद की पत्नी राजबाला वर्मा भी चर्चित IAS रही हैं। वे झारखंड की मुख्य सचिव भी रह चुकीं हैं।



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